वर्तमान में ग्रन्थालय प्रसूचीकरण के नए तरीकेः एक अवलोकन
सतीष कुमार
एम. लिब. महर्षि दयानन्द विष्वविधालय, रोहतक
*Corresponding Author E-mail: satish98641@gmail.com
ABSTRACT:
इस पेपर का उद्देष्य ग्रन्थालय प्रसूचीकरण की वर्तमान प्रवृति पर प्रकाष डालना है। ग्रन्थालय प्रसूचीकरण ग्रन्थालयों में पुस्तक (ग्रंथ) प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण कार्य है। बिना ग्रन्थालय प्रसूचीकरण के ग्रन्थों को सुनियोजित, सरल व आकर्षक स्वरूप में स्थापित (रख पाना) असंभव कार्य होता है। प्रसूचीकरण के बिना ग्रन्थालय का स्वरूप वास्तविक प्रतीत नहीं हो पाता है और न ही ग्रन्थालय की छवि में हम आवष्यक सुधार कर पाते है। अतः एक ग्रन्थालय में प्रसूचीकरण को हम उसकी रीढ़ कहे तो गलत नहीं होगा। इस पेपर में सुधार के साथ वर्तमान के स्वरूप का वर्णन किया गया है।
KEYWORDS: vksisd (opac), ekdZ (marc), M+sVkcsl database, bUVjusVA A
ÁLrkouk %&
आधुनिक प्रसूचीकरण का उद्भव 19वीं शताब्दी में माना जाता है। ग्रन्थालयों के क्षेत्र में प्रसूचीकरण तथा वर्गीकरण की दो प्रक्रियाएँ है। जो आज भी सभी प्रकार के ग्रन्थालयों में प्रयोग लाई जाती है। ग्रन्थालयों में प्रसूचीकरण कार्य अनेक प्रकार से किया जाता है। जिसके लिए विभिन्न प्रसूची संहिताएँ उपयोग में लाई जाती हैं। इन प्रसूची सहिंताओँ के विकास स्वरूप वर्तमान में अत्यधिक बदलाव संभव हो पाया है। और अब भी निरंतर हो रहा है। अब वर्तमान में प्रसूचीकरण के क्षेत्र में क्या नई प्रवृतियाँ है उनका विवरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
परिभाषाः-
कैटाॅलाग ;बंजंसवहनमद्ध षब्द, जिसका हिन्दी रूपान्तरण ग्रन्थालय प्रसूची होता है, जिसकी उत्पति ग्रीक भाषा के षब्द कैटालोगोस से हुई है। जो दो अलग-अलग षब्दों से मिलकर बना है। कैटा ;बंजंद्ध का अर्थ ‘‘के अनुसार’ तथा लोगोस का अर्थ‘ तर्क या क्रम’ होता है। इस प्रकार कैटालोगोस शब्द का अर्थ ‘तर्क’ या क्रम के अनुसार ग्रथंालय की सामग्री प्रदर्षित करना है। समय के साथ-साथ प्रचलन में रहकर यह षब्द वर्तमान में कैटालोग (प्रसूचीकरण) में प्रसिद्ध हो चुका है। जो वर्तमान में पुरे इसी वर्तनी से जाना तथा लिखा जाता है। ग्रंथालय प्रसूची को अनेक विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाओं में से कुछ निम्न हैः-
अ जेम्स डफ ब्राऊन के अनुसारः- विषय वर्गीकरण पद्वति के निर्माता ब्राऊन महोदय ने अपनी पुस्तक ‘मेन्युअल आॅफ लाइब्रेरी इकोनोमी’ में ग्रन्थालय प्रसूची की परिभाषा इस प्रकार दी हैः-
व्याख्यात्मक तर्कपूर्ण ढ़ंग से व्यवस्थित ग्रंथों तथा उनकी विषय वस्तुओं की सूची एवं कुजीं है। तथा यह किसी ग्रंथालय विषेष के ग्रन्थों तक ही सीमित होती है।
ब सी. ए. कटर के अनुसारः- प्रसूची ग्रन्थों की एक तालिका है जो किसी व्यवस्थित योजना के अनुसार व्यवस्थित होती है।
स एम. एस. टेलर के अनुसारः- ग्रन्थ सूची किसी विषेष अथवा विषयों से संबंधित ग्रंथो अथवा पाण्डुलिपियों की तालिका होती है। प्रसूची भी एक तालिका होती है। परन्तु इसका क्षेत्र केवल किसी संग्रह विषेष तक ही सीमित होता है।
· ग्रन्थालय प्रसूची के निम्नलिखित का समय-समय पर उद्भव हुआः-
1 ब्रिटिष म्युजियम कोड-1841
2 कटर रूल्स (रूल्स आॅफ डिक्षनरी कैटालोग)-1876
3 एक्सपेंषिव क्लासिफिकेषन - 1891
4 एंग्लो-अमेरिकन कोड़ - 1908
5 वेटिकन कोड़ ;टंजपबंद बवकमद्ध - 1931, द्वितीय प्रकाषन 1939
6 एंग्लो-अमेरिकन कैटालोग रूल्स -प् - 1967
7 एंग्लो-अमेरिकन कैटालोग रूल्स -प्प् - 1978
8 एंग्लो-अमेरिकन कैटालोग रूल्स-2 पुनर्मुद्रित -1988
· प्रसूचीकरण/सूचीकरण की नई प्रवृतियाँ:-
प्रसूचीकरण के क्षेत्र में विभिन्न प्रयोग और विकास क्रम के फलस्वरूप तथा ग्रन्थालय के कामों में कम्प्यूटर का अनुप्रयोग ने प्रसूचीकरण स्वचालन में भी नऐ परिवर्तन कर दिये है। जिसके परिणामस्वरूप इण्टरनेट, वेबसाइट एवं ड़िजीटल लाइब्रेरी जैसी नई अवधारणाओं का जन्म हुआ है। और नवीन आयाम स्थापित हुए तथा नवीन प्रवृतियों का भी आगमन हुआ जो निम्न हैः-
1 ओपेक (आॅनलाइन पब्लिक एकसेस कैटालाॅग)
2 एए सी आर-2 का विकास
3 प्रसूचीकरण मानक
4 प्रसूचीकरण /सूचीकरण नेटवर्क।
1- ओपेक (आॅनलाइन पब्लिक एकसेस कैटालाॅग)ः- ओपेक, आॅनलाइन पब्लिक एकसेस कैटालाॅग का संक्षिप्त रूप है। जिसका अभिप्राय उपभोक्ता की सुविधा हेतू कम्प्यूटर टर्मिनल द्वारा ग्रन्थालय प्रसूची का अभिगम प्रदान करना है। ओपेक का प्रयोग सर्वप्रथम अमेरिका में 1970 के अंत में तथा इसके बाद इंग्लैंड़ द्वारा किया गया था। यह एक त्वरित सूचना सेवा है।
ओपेक के माध्यम से उपभोक्ताओं को आॅनलाइन प्रसूची से प्रलेखों को खोजने एवं प्राप्त करने की सुविधा प्राप्त होती है। इसके अलावा आॅनलाइन आरक्षण, उपभोक्ताओं की स्थिति का निरिक्षण आदि भी ग्रन्थालय प्रबंध साॅफ्टवेयर के द्वारा प्राप्त हो जाती है। वर्तमान में वल्र्ड वाइड़ वेब (ूूूद्ध के विकासस्वरूपं अब अधिकतर ग्रंथालय ओपेक द्वारा अपने प्रलेख की खोज कर सकते है। ओपेक को चार भागो में बांटा गया है।
(i) उपयोक्ता इण्टरफेसः- इसमें उपयोक्ता द्वारा खोज संकेतों जैसेः- लेखक, आख्या, मुख्य शब्द, विषय षीर्षक आदि का उपयोग करके खोज आवश्यकता को पुर्ण किया जाता है।
(ii) मुख्य प्रसूची डेटाबेसः- यह डेटाबेस एक पत्रक प्रसूची के समान होती है। जो अनेक क्षेत्रोें, उपक्षेत्रों से मिलकर बनाता है। जिसमें लेखक का नाम, प्रलेख की आख्या आदि को दर्षाया जाता है।
(iii) अनुक्रमणिका फाइलः- जिस प्रकार मुद्रित प्रलेख के अन्त में अनुक्रमणिका प्रदर्षित की जाती है। उसी प्रकार मषीन पठनीय डेटाबेस में अनुक्रमणिका फाइल निहित होती है। जिसमें अनुक्रमणिका पद तथा संकेत होते है।
(iv) प्रदर्षन/मुद्रित स्वरूपः- इसके अंतर्गत विभिन्न प्रलेखों के ग्रन्थपरक अभिलेख विभिन्न गुणो से संबंधित अपरिष्कृत डेटा (त्ंू कंजं) को जब हम कम्प्यूटर की स्क्रीन पर मुद्रित करना या देखना चाहे तो यह साॅफ्टवेयर अंतर्निहित डेटा लेकर एएसीआर-2 के अनुसार प्रस्तुत कर देता है।
· ओपेक खोज विधि- ओपेक खोज करने हेतु दो प्रमुख विधि निम्न हैः-
1 बुलियन खोज- बुलियन खोज पदों को खोजने की विधि है। यह जाॅर्ज बूले द्वारा विकसित की गई है। इसमें तीन प्रकार का प्रयोग हुआ हैः-
I ,.M+ (AND) (II)
(i) तर्कपूर्ण धन ($) प्रचालक (एण्ड) And
(ii) तर्कपूर्ण स्टार ;’द्ध प्रचालक (ओर) or
(iii) तर्कपूर्ण ऋण (.द्ध प्रचालक (नोट) Not (नाॅट)
(iv) (2) Vªads’ku (Truncation) & aइस खोज विधि को वर्ड सेगमेंट सर्च ;ूवतक ेमहउमदज ेमंतबीद्ध के रूप में जाना जाता है। इसमें षब्दों का ट्रंकेषन मध्य में या दोनों सिरों पर किया जा सकता है।
2- ,,lhvkj&2
¼,axyks&vesfjdu dSVkyWkfxax :Yl&2½ dk fodkl%& ,,lhvkj&2 dk izdk’ku ,,y ,] ,y , vkSj dukfM+;u iqLrdky; lad }kjk lu~ 1978 esa fd;k x;k FkkA tks nks Hkkxks esa izdkf’kr gqvk FkkA
(i) Hkkx&1 fooj.k%&
यह भाग प्ैठक् ;ळद्ध के प्रारूप तथा अ-पुस्तक सामग्रियों के नियमों पर आधारित है।
(ii) भाग-2 प्रविष्टि और शीर्षकः-
यह सिद्धान्त पेरिस सिद्धांतों (1961) पर अधिक अमल के लिए था।
इसका पुनर्सषंोधित संस्करण 1988 तथा 2002 में प्रकाषित किया गया जिसे एएसीआर-2 आर नाम दिया गया है।
एएसीआर-2 आर को सफल बनाने का श्रेय आर डी ए (त्क्।द्ध को जाता है।जो 2003 में आया था।
वर्तमान में एएसीआर का संषोधित संस्करण एएसीआर-2 आर (1988) प्रयोग में लाया जाता है।
3- प्रसूचीकरण मानकः-
प्रसूचीकरण मानक वे मानक है जो प्रसूची को आधार प्रदान करते है। अनेक राष्ट्रीय मानकों को एक मिश्रित रूप में आई एस ओ (प्ैव्) 2709 के नामकरण से अपनाया गया है।
कोई राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय मानक का विलयन तभी होता है जब इनके अभिलेख निम्न रूप से परस्पर समानुरूपी हों।
(i) अभिलेख सरंचना
(ii) अंतर्वस्तु अभिज्ञापक।
(iii) डे़टा तत्वों की परिभाषा।
आई एस ओ 2709 मानक अभिलेख संरचना से संबंधित है। वर्तमान मेें अनेक ग्रन्थपरक प्रारूप विधमान है जो अधिकतर मार्क ;उंतबद्ध मषीन रिडे़बल कैटालोग से संबंध है जैसेः- ;न्ैड।त्ब्द्ध यु एस मार्क, युके मार्क,युनिमार्क आदि।
मार्क के साथ-साथ उपभोक्ताओं की परिवर्तनषील आवष्यकताओं के कारण सी सी एफ के दो मानक सेट है। 1 सी सी एफ/बी 2 सी सी एफ/एफ
1 सी सी एफ/ बी-ग्रन्थपरक अभिलेखो हेतू।
2 सी सी एफ/एफ-तथ्यात्मक अभिलेखो हेतू।
अब अभिलेखो को संबंद्ध करने हेतू बहुसंख्यक क्षेत्रों की भी संयुक्त किया जा चुका है। सी सी एफ युनेस्को द्वारा विकसित किया गया है।
1 आई एस ओ 3297 पत्रिकाओं के क्षेत्र में ;पपद्ध प्ैव् 2108 पुस्तकों के प्रबंध के क्षेत्र में प्रदान किया जाता है।
4 प्रसूचीकरण नेटवर्कः- प्रसूचीकरण नेटवर्क का मुख्य उद्देष्य यह है कि किसी एक संस्था या ग्रन्थालय द्वारा प्रसूचीकरण कामों को केन्द्रीय रूप में संपन्न करना ताकि अन्य सहभागी ग्रन्थालय प्रसूची का उपयोग कर सके। अब तक अनेक नेटवर्क स्थापित हो चुके है। परन्तु ओ सी एल सी (ओहियो कालेज लाईब्रेरी सैंटर) सबसे पुराना तथा महत्वपूर्ण एवं अंतराष्ट्रीय स्तर का ग्रन्थालय नेटवर्क है। जो 1967 में अस्तित्व में आया था। वर्तमान में इसका नाम 2017 से ओ सी एल सी (आॅनलाइन कम्प्यूटर लाइब्रेरी सैंटर) है। ओ सी एल सी लाभ रहित कम्प्यूटर सेवा एवं अनुसंधान संगठन है। जो लगभग 122 देषों के 16964 ग्रन्थालयों को अपनी सेवाएँ प्रदान करता है। इस नेटवर्क की सेवा प्रसूचीकरण सेवा के साथ उत्पादकता में वृद्धि तथा लागत में कमी लाने में सहायक है। ओ सी एल सी की स्थापना फ्रैंड किलगोर ने 6 जुलाई 1967 को की थी।
· ओ सी एल सी के उत्पाद सेवाः-
· फस्र्टसर्च
· वेबजंक्सन
· वल्र्ड शेयर
· डी डी सी
· वल्र्डकैटः-
ओ सी एल सी द्वारा संचांलित आॅनलाइन संघ प्रसूची विश्व की विशालतम एवं विस्तृत सेवा वाला ग्रन्थपरक डेटा बेस है। इसका उपयोग सूचना की सहभागिता के लिए ग्रन्थालयो द्वारा ओ सी एल सी दूरसंचार नेटवर्क के माध्यम से किया जाता है।
कैलासिफाइड़ कैटालोग कोड़ भारतीय पुस्तकालय के जनक डा. एस आर रगानायन द्वारा दी गई प्रथम भारतीय सूची संहिता थी जिसके समय-समय पर निम्न प्रकाषन हुएः-
1 प्रथम संस्करण-1934
2 द्वितीय संस्करण-1945
3 तृतीय संस्करण- 1954
4 चतुर्थ संस्करण-1958
5 पंचम संस्करण-1964
· 1 से 3 तक के संस्करणों में अनेक बदलाव किए गए।
· 4वें संस्करण में बदलाव करके ‘ए कैलासिफाइड़ कैटालोग कोड़ विद एड़िषनल रूल्स फाॅर डिक्षनरी कैटालोग कोड के नाम से 1964 में प्रकाषित किया गया। जो वर्तमान में प्रचलित नाम है।
· वर्तमान में प्रसूचीकरण की प्रवृति कम्प्यूटरीकृत हो चुकी है इसकी शुरूआत प्रसूची कार्ड़ से हुई थी। समय अनुरूप बदलाव को स्वीकार करते हुए आज स्वचालन एवं इन्टरनेट के माध्यम से सरल, सुलभ तथा तत्परता को धारण कर चुकी है।
लाभः-
समय के बदलाव के साथ प्रसूची के नए तरीकों का आगमन समय की मांग है इसके अन्तर्गत निम्न लाभ भी है।
1- समय की बचत।
2- नवीन तकनीको की जानकारी।
3- विष्व स्तर का समायोजन
4- समय के साथ बदलाव की सार्थकता सिद्ध होती है।
चुनौतियाँः- ग्रन्थालय प्रसूचीकरण में ग्रन्थों के साथ-साथ सीडी रोम, आॅडियो, विडियो, ग्लोब, मानचित्र तथा अन्य इलैक्ट्रानिक ड़िवाइस के रूप में संग्रह होता है। इस प्रकार से इस विशाल संग्रह का सही रूप में संरक्षित तथा पुर्नप्राप्ति में अनेक बाधाएं आती है।
1 सूचना का अति विस्फोटक होना
2 विषयों की संख्या में तीव्र बढ़ोतरी।
3 क्षेत्र विस्तार के कारण प्रसूचीकरण में कठिनाई।
4 प्रसूचीकरण तथा विषय आधारित सेवाओं में संसाधन संगठन एवं अन्वेषण में धन का अधिक व्यय होता है।
5 परम्परागत तरीकों के बजाय इन्टरनेट तकनीकों का प्रयोग।
· डिजिटल प्रसूचीकरण के प्रचलन से सभी सूचनाएं अंकीय रूप में उपलब्ध होती है। डिजिटल में मषीनी प्रचलन होने के कारण परम्परागत विधि का अस्तित्व न के बराबर रह जाता है। वल्र्ड वाईड वेब तथा इन्टरनेट से संबंधित होना प्रकृति के प्रतिकुल के साथ-साथ स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव को अंकित करता है।
निष्कर्षः-
इस पेपर में प्रसूचीकरण के नए तरीको से संबंधित मार्क ;ड।त्ब्द्ध तथा अन्य मानकों के उद्भव के साथ ए ए सी आर-2 व सी सी सी के विकास की भी विवेचना की है। ओपेक क्या है, कैसे कार्य करता है तथा इसके ड़िजाइन में प्रसूचीकरण के महत्व के साथ ओसी एल सी की सेवाओं और विषेषताओं पर भी रोषनी डाली है।
संदर्भ सूची
1- गिरजा कुमार और कृष्ण कुमार (1992) सूचीकरण के सिद्धान्त, नई दिल्लीः
2- IGNOU (1994) Bibliography bxuw ¼1994½ fcfCy;ksxzkfQd fMfLØIlu vkWQ ukWu&fizUV eSVsfj;y ,e ,y vkbZ ,l&03 CykWd 2-pp.4&52-
3- त्रिपाठी, एस. एम. (1997), माॅर्डन कैटालाॅगिग- थ्योरी एण्ड प्रैक्टिस. आगराः श्री राम मेहरा
4- शर्मा, पाण्डेय एस. के. (1998) सरलीकृत पुस्तकालय प्रसूचीकरण सिद्धान्त। दिल्लीःसत्साहित्य प्रकाषन।
5- अग्रवाल,श्याम सुन्दर (1997) ग्रन्थालय सूचीकरणः एक अध्ययन भोपालः मध्यप्रदेष हिन्दी ग्रन्थ अकादमी।
6- ध्यानी, पुष्पा ,(2002) ग्रन्थालय वर्गीकरण। नई दिल्लहः एस. एस. प्रकाषन।
Received on 10.10.2020 Modified on 30.10.2020
Accepted on 21.11.2020 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2020; 8(4):251-255.